कुछ लेना है तो कुछ देना पड़ेगा......मीडिया का सच भाग-8

जी हां कुछ लेना है तो कुछ देना ही पड़ेगा। यहां सब चलता है आप कुछ भी दे सकते हैं। चाहे वो पैसा हो या कुछ और.....यहां सब लिया जाता है। ये निर्भर करता है आप है कौन और आप देना क्या चाहते हैं। यहां सबसे ज्यादा लेना देना चलता है या तो नौकरी लगाने के नाम पर या फिर ऐंकरिंग करवाने के नाम पर। अरे यार नौकरी का मामला तो हर जगह होता है लेकिन मीडिया में सबसे ज्यादा लेन देन होता है ऐंकरिंग जैसी ग्लैमरस जॉब को लेकर। इसका सबसे बड़ा कारण है कि इस फील्ड में आने वाली हर लड़की या लड़का अक्सर यही सोचकर आता है कि वो जैसे ही किसी चैनल में जॉब के लिए घुसेगा उसे एंकरिंग मिल जायेगी। बस वो टीवी पर आने लगेगा। ये सपना हर कोई देखता है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन गलती तब हो जाती जब वो इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। मैने देखा है कि चैनल में काम करने वाले सभी नये कर्मचारी काम कम अपने बॉस से बातचीत में ज्यादा व्यस्त रहते हैं। एक बात और क्योंकि ये काम काफी ग्लैमरस होता है तो अक्सर लड़कियां ऐंकर ज्यादा बनना चाहती हैं। मेरे साथ में भी कई लड़कियां काम करती हैं जो अपना काम तो करती रहती हैं लेकिन अगर कोई टीवी ऐंकर सामने आ जाये उसे ताकते रहने में उन्हे ज्यादा मज़ा आता है। यहां पर एक उदाहरण से शुरु करुंगा आगे की बात, कि क्या आपने देखा है कि जब कोई मछली पकड़ने जाता है तो अपने साथ चारा तो ले ही जाता है लेकिन जगह वही चुनता है जहां हलचल ज्यादा हो या कहें कि बुलबुले ज्यादा उठ रहे हों या मछलियां उपर आने की कोशिश कर रही हों। ठीक ऐसा ही तब होता है उन लोगों के साथ जब उनकी चाहतें हद ज्यादा हलचल पैदा करती हैं या कहें कि चाहत के बुलबुले उठने लगते हैं उस वक्त उन शिकारियों को मौका मिल जाता है शिकार करने का जो मछलियों के शौकीन होते हैं। चारा तो वो लेकर ही चलते है मीठी बातों का चारा....फिर शुरु होता है लेने देने का खेल..क्या लेना है और क्या देना है। लड़कों के साथ तो ऐसा नहीं है, उनको को बहुत कुछ देना पड़ता है। कई पैसों के खेल में फंस जाते हैं, कुछ को कमरे देने पड़ते हैं ,कुछ को शराब पिलानी पड़ती है ये वो कुछ चीज़े हैं जो लड़को को करनी पड़ती हैं। उस वक्त ये चीजें बहुत छोटी मालूम पड़ती हैं लेकिन इसका खामियाज़ा आगे भोगना ही पड़ता, जब काम देने वाले के पैसों के गुलाम बन जाते हैं वो लड़के। बात करें ग्लैमरस चेहरों की तो लड़कियों को क्या करना पड़ता ये मुझे कहने या लिखने की जरुरत नहीं है। अक्सर हम ये चीजें फिल्मों में देखते ही हैं। पहले मुझे ये गलत लगता था लेकिन यहां पर मैने देखा कि मै गलत था। यहां वो सब होता है जो फिल्मों में दिखता है। अब इसमें ये बात अलग है कि महत्वकांक्षा के आगे ये सब बातें फीकी साबित हो जाती हैं अक्सर। जी हां जब पैसे और ग्लैमर की चाहत सोच पर हावी हो जाती है उस वक्त इज्जत, ऊंची सोच जैसी बातें ओछी लगने लगती है। और ऐसी बातें करने वालों को उस तरह के समाज से बहिष्कृत भी कर दिया जाता है। लेकिन हां जो ये सोच कर कुछ भी करने को तैयार होती है कि बाद में सब ठीक हो जाएगा उनकी इस सोच को ऐसी ठोकर लगती है कि उनका उबरना मुमकिन नहीं हो पाता कुछ उसको अपना लेती है और वहीं उनका जीवन हो जाता है। यहां ऐसे ही चलता है एक हाथ ले तो एक हाथ दे। मेरी सलाह तो यही है कि काम पर विश्वास रखा जाये। किसी चीज़ का कोई शार्टकट नहीं होता और अगर होता है तो उसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है और वो कीमत ज़िदगी भर उस काम की असली खुशी महसूस नहीं होने देती।

सर वो.... बहाना बना रहा है


रात के दस बज रहे हैं और मैं सोने की तैयारी कर रहा था कि तभी मेरे फोन की मनहूस घंटी बजती है। मनहूस इसलिए क्योंकि जब जब ये बजती है तब तब मुझे शिफ्ट पूरी करने के बाद भी दूसरे की शिफ्ट करनी पड़ती है। मै ऑफिस पहुंचा मेरे सर ने मुझसे कहा कि भाई देखो ऐसा करो कि तुम ज़रा थोड़ी देर की शिफ्ट कर लो सारिका की( परिवर्तित नाम) मैने कहा कि क्यों सर क्या हुआ वो क्यों नहीं आई। उन्होने कहा कि वो कुछ बीमार है मैने कहा कि सर अमर कि आज कहीं शिफ्ट नहीं लगी है तो उससे करवा लीजिये। नहीं यार तुम्हे करना है तो कर लो किसी और की नाम मत सुझाओ। मैने कहा कि बास का मूड बिगड़ने से पहले हां कर दो नहीं तो इसका गलत परिणाम भुगतना पड़ सकता है। मैने हां कर दी। अब यहां की हालत न पूछिये। यहां आप अपना काम तो करिये साथ ही दूसरे का काम करने से भी पीछे मत हटिये क्यों कि उस वक्त आपकी कर्तव्यनिष्ठता पर सवाल खड़े होने लगेंगे। यहां उन लोगों को फायदा मिलता है जिन पर आलाकमान का हाथ होता है। यहां आप अपने काम से नहीं बल्कि अपने काम के साथ साथ दूसरों के काम करने से जाने जाते हैं। यहां आप अपना काम करते रहिये ईमानदारी से लेकिन आपको कोई नहीं पूछेगा लेकिन अगर आप आपने किसी औऱ का काम करन से मना कर दिया समझ लिजिये आपने कोई काम नहीं किया जी हां क्योंकि आपकी शिकायत इसी तरह की जायेगी। ईमानदारी यहां आपके काम से नहीं बल्कि दूसरे के काम को करने से नापी जाती है। अगर आप कर्मठ हैं तो समझिये लौटरी लग गई अरे आपकी नहीं उन लोगों की जो आपके बॉस के चहेते हैं। क्योंकि वो अपने काम के लिए आपको बकरा बनायेंगे। और फंस कर काम करते रहेंगे लेकिन मलाई वो खायेंगे और आप मज़दूरों की तरह से काम करते रहेंगे। लेकिन अगर आपने कभी भी ये कह दिया कि आप काम नहीं कर सकते क्योंकि आपकी तबियत खराब है तो वही लोग ये कहने से पीछे नहीं हटेंगे कि साला बहानेबाज़ी कर रहा होगा...मज़े की बात तो ये है कि ये बात तो वो आपके बॉस से कहने से नहीं चूकेंगे। और तो और चार बातें और बतायेंगे। आपसे मदद की उम्मीद हमेशा रखेंगे लेकिन आपकी मदद कभी नहीं करेंगे। क्योंकि उस वक्त उनकी सहूलियत में कटौती करनी पड़ती है। आप कुछ कर भी नहीं सकते क्यों उस वक्त बॉस आपकी नहीं उनकी सुनेगा क्योंकि वो चहेते ज्यादा हैं भाई साहब....

मीडिया का सच----भाग 8...चापलूसी परमो धर्म:

चापलूसी परमो धर्म.. जी हां मै एक ऐसी बात कह रहा हूं जिसका सरोकार कभी न कभी हर किसी से पड़ता है क्योंकि चापलूसों की एक ऐसी दुनिया है जिसमें हर किसी को इंट्री नहीं मिलती है। कभी आपने सोचा है कि ऑफिस में आप भी काम करते हैं और आपके साथी भी लेकिन ऐसा क्यों होता है कि आपके देखते ही देखते दूसरा आपसे आगे निकल जाता है जबकि वो आपसे कम दक्ष होता है। आप कहेंगे कि यार कमाल है... वो आगे निकल जाता है हो सकता है कि वो अच्छा काम कर रहा होगा... लेकिन इसमें उसका अच्छा काम करना नहीं है। इस आगे बढ़ने की कला में उसके द्वारा उस क्वालिटी को आगे लाना है जिसमें हम आप निपुण नहीं हैं। जी हां अब आप कहेंगे कौन सी क्वालिटी भाई। तो भईया हर ऑफिस की तरह मेरे ऑफिस में भी हर रोज इस तरह के करतब सामने आते रहते हैं। हमारे यहां भी लोग काम करने के बाद अपने बॉस को ये बताने ज़रूर जाते हैं कि उन्होने कितना अच्छा काम किया। (एक उदाहरण बिना नाम लिए बता रहा हूं सच मानियेगा) ऐसे ही हमारे साथ काम करने वाले एक कर्मचारी हैं कहने को तो हमारे बैंड एडिटर हैं लेकिन काम करने के बाद ये बताने से पीछे नहीं हटते कि उन्होंने क्या काम किया दूसरे कौन कौन से लोग हैं जिन्होने क्या नहीं किया। हर पांच मिनट बाद बॉस के पास हाज़िरी लगाते हैं। ऐसे लोग ये बताने से भी नहीं चूकते कि ..अरे अगर वो न होते तो चैनल कैसे चलता मेरा मतलब है कि दूसरे के काम को अपना काम बताने से भी नहीं चूकते हैं। (दूसरा उदाहरण बिना नाम लिए) मेरे सामने ही हमारे एक सीनियर साहब पहले तो एक साधारण कर्मचारी थे लेकिन पासा पलटा औऱ जिनकी वो चापलूसी करते थे वो महाशय चैनल के सुपर सीनियर बन गये फिर क्या था हर जगह की तरह शुरु हो गया शिफ्टिंग का खेल और चापलूसी का मीठा फल उन्हें मिल गया और बन गये वो लोगों के बॉस। जैसे की मैने अपने पिछले लेख में लिखा था कि बॉस बनते ही फ्लर्टिंग का महत्वपूर्ण कार्य शुरु हो जाता है वो शुरु हो गया। साथ ही साथ जी हूज़ूरी का काम तो पहले जैसा ही चलता रहा। मन मांगी मुराद पूरी हो गयी। मेरी समझ में ये नहीं आता कि उन्हें मैने अपने कार्य स्थल के अभी तक के जीवन में एक बार भी उन्हें कोई न्यूज़ कॉपी लिखते नहीं देखा, कभी मैने उनका अच्छा वायस ओवर नहीं सुना,(यहां ये बता दूं कि ऐसे लोग दूसरों को काम सीखाने में पीछे नही रहते हैं, हमारे एक धुरंधर आर्टिस्ट को अच्छे काम के गुण सिखा रहे थे) डेस्क पर काम करते नहीं देखा.. तब ये लोग कैसे इतनी बड़ी पोस्ट पर पहुंच जाते हैं कमाल तो इस बात का है वहीं मेरे सामने कुछ बहुत ही धुरंधर लोग भी काम करते हैं जो हर चीज़ में माहिर हैं लेकिन उनकी अनदेखी की जा रही है। ऐसे लोग भी दिन ब दिन टूटते जाते हैं क्योंकि अगर आपको चैनल हेड बना दिया जाता हैं और फिर उस पद से हटा दिया जाए उस वक्त निराशा अपने चरम पर होती है। ऐसा ही हुआ है। कुछ लोग बुरी तरह निराश है वो अपने काम को पूरा कर देते है और घर चले जाते है। लेकिन जो जोश उनमें दिख रहा होता है वो ख़त्म हो जाता है। इसीलिए जो लोग इस फील्ड को अपनाने की सोच रहे हैं वो लोग जल्द से जल्द चापलूसी का मंत्र जिनको नहीं आता वो क्लासेस लेना शुरु कर दें। वो सीख लें या फिर तैयार रहें अपने से कम जानकार को अपना सीनियर बनते देखने के लिए। लेकिन एक सीख उन लोगों के लिए जिनके लिए चापलूसी परमो धर्म है कि भईया तैयार हो जाओ कॉम्पटीटर आ रहे हैं आपसे भी ज्यादा चापलूसी की नई तकनीकि लेकर.....