यहां चाहिए गॉडफादर....


पत्रकारिता जगत में आने की सबसे बड़ी मान्यता जो है वो ये कि यहां आपको किसी न किसी गॉडफादर की जरुरत होती है।बिना गॉडफादर के यहां कोई काम नहीं होता।हमारे चैनल में भी इसी का बोलबाला चलता है॥आप किसी की झूठी बड़ाई करिये और बन जाइऐ उसके चहेते कर्मचारी।बस आपको करना इतना है कि आप बिना बात के अपने हेड की तारीफों के पुल बांधिये॥और कुछ नहीं करना है बस करना इतना है कि आप आपने सीनियर के छोट काम को करने के बाद इतन कहें कि,"अरे सर क्या काम किया आपने बस आप ही आप दिख रहे थे।और हां आपके उस सवाल ने तो जैसे सामने वाले की बोलता ही बंद कर दी थी...वाह सर मज़ा आ गया।" ये जो सब मै लिख रहा हूं वो मेरी कहानी नहीं है मैन जो देखा है वो लिख रहा हूं।इस बड़ाई से होगा ये कि हेड साहब अपनी बड़ाई से खुश हो जाएगें और आप उनके चहेते हो जाएंगे॥और आपको अपना गॉडफादर मिल जाएगा जो आपको हमेशा अपने साथ रखेगा औऱ आपकी मदद करेगा।और आप उसका ताउम्र फायदा उठा सकेंगे,और इसका ज़रुरत का उदाहरण दे रहा हूं।हमारे कार्यस्थल में दो इंस्टिटट्यूट के बच्चे काम करते है।एक वो जो सिर्फ एक इंस्टिट्यूट है और दूसरा वो जिसमें एक चैनल के हेड पढ़ाते हैं।अब मै बताता हूं इसका फर्क क्या पड़ता है।इससे फर्क ये पड़ता है कि जिस इंस्टिट्यूट में हेड पढ़ाते है उनके बच्चों को ज्यादा फायदा मिलता है चाहे उन्हे किसी प्रकार की मदद की ज़रुरत हो। हां न सिर्फ फायदा बल्कि काम में तारीफों के पुल और सुपर बास के आगे की जाने वाली बेफिजूल की तारीफ तो अलग है ही। हां इसका मतलब ये नहीं है कि दूसरे इंस्टिट्यूट के वो बच्चे जो काम करते है उनके अच्छे काम को भी खराब और अपने इंस्टिट्यूट के बच्चों की बेवकूफी को उनका अच्छा काम बताना ही गॉडफादर का होना और उनका न होना बताता है। इसी वजह से बिना सिफारिश के किसी जगह काम करने वालों से अक्सर लोग चिढा करते हैं।और उनके काम को गलत ठहराते है। यहां तक की हेड साहब नौकरी में टिकने न देने और काम से निकलवा देने या कहें कि कैरियर बर्बाद कर देने की भी धमकी देने से पीछे नहीं रहते हैं। अब ये कितना सही है और कितना गलत ये तो आप ही समझें लेकिन इतन तो साफ है कि गॉडफादर अपने लोगों को ही बचायेगा हर किसी को नही इसलिए इस जगत में आना है तो सबसे पहले अपने गॉडफादर का जुगाड़ कर लीजिये। यहां कई मगरमच्छ हैं जो बिना गॉडफादर की मौजूदगी में आपको खाने की पूरी तैयारी में हैं। सावधान यहां गॉडफादर जरुरी हैं....

मी़डिया का कड़वे सच- भाग 5.....मेरी गलती तेरे सर

क्या आपको किसी ने अपनी गलती के लिए गलत ठहराया है...एक बार मै तंग आकर ऑफिस में बरबस यूं ही बोल गया कि आइडिया हमेशा बॉस के दिमाग में क्यों आता है और बॉस की गलती हमेशा मुझसे क्यों होती है'' इस सवाल का जवाब मुझे आज तक नहीं मिल सका है
...मै यहां बात करुंगा अपने करियर की शुरुआत की...जब मैं जूनियर था....बात में ऑफिस की करुंगा...हमेशा गलती का ठीकरा मेरे सर ही थोपा जाता था । ऐसे ही एक बार मेरे एक सर मुझे समझा गया कि देखों टिकर(टिकर वो होता जाता जो टीवी स्क्रीन पर शब्द चलते है स्क्रीन के नीचे की पट्टी पर) पर ये गलत चल रहा है इसे ठीक करो । इसमें शब्द गलत चल रहे हैं । मैने उनसे कहा कि ये सही लिखा है सर आप कंफ्यूज़ हो रहे हैं...लेकिन उनको उस शब्द पर कम अपनी वरिष्ठता पर ज्यादा विश्वास था , सो वो गलत लिखवा कर चले गये । थोड़ी देर बाद उनके सीनियर आ गये उन्होने देखा कि वो शब्द गलत चल रहा है टीवी पर । तो उन्होने ने मुझे बुलाया और इसे ठीक करने को कहा मैने कहा कि सर मैने ठीक ही लिखा था पर ये तो दूसरे सर ने गलत लिखवा दिया....तो उन्होने हमारे सीनियर को बुलाया तो वो महाशय तो साफ मुकर गये वो कहते हैं कि सर ये तो इंटर्न है इसने ही गलत लिख दिया होगा मै इतनी बड़ी गलती क्यों करुंगा । इस बार भी उन्हें अपनी वरिष्टता पर यकीन था कि वो तो बच जाएगें और मेरी वाट लग जाएगी । लेकिन वो तो भला हो सुपर सीनियर सर का कि वो पहले से मेरा काम देख चुके थे और कई दिनों से अपने उस पुराने साथी के काम को झेल भी रहे थे । इसलिए मुझे कुछ कहा नहीं , खैर ये तो हुई एक घटना अब मै एक और घटना बताता हूं जिसमें कैसे लोग अपनी गलती दूसरे के सर मढ़ते हैं , ये सब ज्यादातर मीडिया में होता हैं क्योंकि यहां पर कोई अलग काम नहीं करता सभी का काम किसी न किसी से जुड़ा होता है । इसलिये यहां पर एक दूसरे के सिर गलती मढ़ने का काम ज्यादा होता है । मै शुरु करता हूं चैनल के सबसे ग्लैमरस काम यानी टीवी ऐंकरिंग से । मै एक दिन पीसीआर जहां से कोई प्रोग्राम रिकॉर्ड होता है और फिर ऑन एयर होता है , वहां खड़ा था, मैने देखा कि एक ऐंकर आया वो अपना सीट पर आकर बैठा अब बुलेटिन रिकॉर्ड होने का काम शुरु हुआ । एक ख़बर रिकॉर्ड हो गई दो हो गई और जैसे ही तीसरी रिकॉर्ड होने वाली थी वहां पर टीडी साहब जो बुलेटिन रिकॉर्ड करवा रहे थे उनका कॉल आ गया । वो बतियान लगे तो काम लेट हो गया । बुलेटिन में लेट होते ही सीनियरों का आना शुरु हो गया तो टीडी महोदय ने ऐंकर पर ये कहकर आरोप लगा दिया कि ये लेट हो गये थे जिसकी वजह से फ्रेम बनने में लेट हो गया जिससे बुलेटिन देर से रिकॉर्ड हुआ । अब नया एंकर क्या कहता औऱ कोई क्यों मानेगा उसकी जब सीनियर टीडी उसे दोषी ठहरा रहा है तो सीनियर सर ने बढ़िया से उस एंकर की ख़बर ली और चले गये । अपनी गलती ऐंकर के सिर मढ़कर टीडी ने अपनी नौकरी तो बचा ली पर उसकी नौकरी बचेगी या नहीं कोई नहीं जानता । ऐसी ही एक घटना और है जिसको संक्षेप में बता रहा हूं कि एक बार एक एंकर ने कुछ गलत बोल दिया था टीवी पर । अब एक सीनियर सर जो कि काम से तो नहीं पर पद से सीनियर ज़रुर थे उन्होने पास ही रखे टीवी की वाल्यूम तेज़ करके गलती बताना शुरु कर दी, ऐंकर को नहीं आस पास के लोगों को , वो सिर्फ इसलिए कि वो एंकर नया था, सच मानिए उन महोदय ने अपने पूरे कैरियर में कभी एंकरिंग की कुर्सी पर भी नहीं बैठे होंगे पर, इसलिए उन्हें क्या जानकारी होगी एंकरिंग की वो तो आप समझ गये होंगे । और छोटी सी उम्र में एंकर बन गये उस लड़के को अपनी वरिष्ठता का सबक सिखाने लगे थे । इस क्षेत्र में क्या, लगभग हर क्षेत्र में ये होता है कि आपके अच्छे काम को कोई नही सराहेगा पर आपकी गलती को हर कोई बार बार सुनना देखना और दिखाना चाहेगा । और जो कोई ऐसा करे निश्चित ही वो आपका दोस्त तो नहीं हो सकता......नये लोगों से यही कहुंगा कि संभल कर काम करें क्यों कि हर शाख पर उल्लू बैठा अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा....भगवान जाने , संभल कर रहें।

मीडिया के कड़वे सच- भाग 4....इंटर्न्स...फ्री के मजदूर..

मै एक पत्रकार हूं इसलिए बात मीडिया की करता हूं पर मीडिया क्या किसी भी क्षेत्र में करियर की शुरुआत अगर होती है तो वो होती इंटर्न्स बनकर....लेकिन मीडिया में इंटर्न्स से काम लिया जाता है मज़दूरों कि तरह....मै औऱ जगहों कि बात तो नहीं करुंगा मैं बात करुंगा अपने ऑफिस की.....हमारा एक नामी चैनल है जो सिर्फ ख़बर दिखाता है क्योकि उसे लगता है बाकी सब भ्रम है औऱ वो ख़बर हैं...इनका एक इंस्टिट्यूट हुआ करता था...जो कि अब बंद हो गया है.....इसके पहले बैच के बच्चों को शतप्रतिशत प्लेसमेंट के सपने दिखाकर लाखों रुपये ले लिये गये.....इनका बाकायदा कोर्स भी कराया गया.....मेरी जिन बच्चों से बात हुई है उनमें से कुछ तो कहते हैं कि वहां पढा़ई सिर्फ नामभर को होती थी....औऱ कुछ कहते है कि नहीं होती थी.....इन लोगों को बाकायदा प्लेसमेंट भी मिली और वादे के मुताबिक प्लेसमेंट मिली.....ये अलग बात है कि पहले तो इनसे वादा किया गया था कि इन्हें पंद्रह हज़ार के आसपास की सैलरी दी जाएगी पर समय बदला और रकम पंद्रह से पांच तक आ गई
...किसी तरह बच्चों को कुशल प्रबंधन तंत्र ने चुप करा दिया था अब बच्चे भी क्या करते उन्होने लाखों रुपये फंसा दिये थे इस लालच में कि चलों कुछ तो मिला....मै यहां उनकी हालत बता दूं उस वक्त की जब ये बच्चे पढ़ रहे थे...इनमें ज्यादातर वे लोग थे जो मीडिया में धक्के खाने के बाद इसलिए यहां एडमिशन ले चुके थे क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि कम से कम नौकरी तो मिली या कहें कि इन्ट्री तो मिली....इसलिए सभी चुप थे इस उम्मीद में कि चलो कम से कम नौकरी तो मिली भले ही पांच हज़ार की ही क्यों न हो......असली शोषण तो अब शुरु हुआ था....लगभग 108 बच्चों को उनके कोर्स के हिसाब से अलग अलग विभाग बांट दिये गये ये कहकर कि आप एक महीने इंटर्न की तरह काम करेंगे औऱ फिर बाद में आपको प्रोबेशन पर पांच हज़ार रुपये दिए जाएंगे....दिखावे के लिए बाकायदा एक कागजी दस्तावेज़ भी दिया गया....लेकिन समय बीतता गया औऱ एक महीने बाद शुरु हुआ प्रोबेशन पीरीयड.....अभी तक कोई भी कागज़ी कार्रवाई नहीं कि गई थी....इस चाल को ये छोटे बच्चे समझ नहीं पा रहे थे....क्योंकि अगर कागज़ी कार्रवाई हो जाती है तो पैसे तो कानूनी रुप से देने पड़ते हैं....इसलिए एक प्लानिंग के तहत इन लोगों को किसी तरह का दस्तावेज़ नहीं दिया गया जिससे ये लगे कि ये लोग संस्था के कर्मचारी नहीं हैं.....लगभग दो महीने बीत गये अब आई सैलरी देने की बारी....इन मजदूरों कि तरह काम करने वाले बच्चों से कहा गया कि आप लोग काम अच्छा नहीं करते हैं......पिछले दो महीने से 15 से 16 घंटे काम करवाने के बाद उनसे कहा जाता है कि आप लोग काम ही नहीं करते ....वहीं एक बात गौर करने लायक है कि जिस वक्त इस चैनल से लगभद सभी लोग छोड़कर जा चुके थे औऱ बहुत ही कम लोग इस चैनल में काम कर रहे थे उस वक्त इन्ही फ्री के मज़दूरों ने चैनल में काम करके उसकी डूबती नैय्या को पार लगाने में मदद की....लेकिन दो महीने फ्री मे काम करवाने के बाद उनसे कहा जाता है कि आप काम ही नहीं करते आपका एसेसमेंट किया जाएगा......मरते क्या न करते की तर्ज पर इन बेवकूफ बने बच्चों ने इस पर भी काम्प्रोमाइज़ किया....फिर एक महीना बीत गया सभी ने लगन से काम किया औऱ अच्छा काम किया वो अलग बात है कि इस बीच कुछ मौकों पर यहां के कुछ कर्मचारियों ने इनका शोषण भी किया औऱ अपनी गलतियां इनके सर मढ़ने की कोशिश भी की पर फिर भी सभी कुछ सहन करते हुए ये काम करते गये ये सोच कर कि चलो सीनियर तो कुछ न कुछ बोलते ही है.....पर आज भी इन बच्चों को उनके पैसे नहीं मिल रहे हैं आज लगभग पांच महीने होने वाले है औऱ इन बच्चों को इनकी मेहनत की कमाई की झलक तक देखने को नहीं मिली है...मिला है तो बस सैलरी मिल जाने का आश्वासन जो कि तब से मिल रहा है जब से ये चैनल ज्वाइन किया है....कभी कोई ग्रुप एडीटर ये कहता है कि अगर वे सैलरी नहीं दिलवा पाये तो चैनल छोड़ देंगे.... और तो और या तो कोई चैनल हेड कहता है कि वो कोशिश कर रहे हैं कि सैलरी मिल जाएगी पर अंत में वहीं ढाक के तीन पात.....ये सिर्फ इस चैनल का सच नहीं है लगभग हर चैनल में यही होता है कि इंटर्न्स से मज़दूरों की तरह काम लिया जाता है गलत कामों पर डांटा भी जाता है पर जब पैसे देने की बात आती है सब हाथ खड़े कर लेते हैं.....एक बात औऱ बता दूं कि अगले भाग में मै चर्चा करुंगा सीनियर के सुझावों और सलाहों की सच्चाईयों पर.....क्या है आपकी राय ज़रुर बताईयेगी औऱ ये सच हर उन लोगों तक पहुचाईयेगा जो लोग मीडिया में रहकर काम करना चाहते हैं..

मीडिया के कड़वे सच - भाग ३.......पैसा बोलता है

नमस्कार मित्रों मै इस बार वो लिख रहा जिसका पता चलने के बाद मेरी अंतर्रआत्मा मुझे धिक्कार रही है...लेकिन सच तो ये है कि इसका जवाब शायद किसी भी पत्रकार के पास न हो....मै हमेशा कि तरह काम पर जाने से पहले अपनी सीट पर तैयारियों में जुटा था....तभी मेरे सामने रखे एक फोन पर कॉल आया .मुझे लगा कि ये हमेशा कि तरह कोई नेता अपने खिलाफ़ चल रही किसी ख़बर को रोकने के लिए कॉल कर रहा होगा....मेरे साथ में बैठे मेरे सीनियर कल्पेश ( काल्पनिक नाम) ने फोन उठाया......पता नहीं करीब पांच मिनट तक वो कुछ ख़ास नहीं बोले पर अंत में उन्होने कहा कि उसको वोट मत देना....और फोन रख दिया...दुखी नज़र आ रहे थे...मुझसे बोले कि एक आदमी का फोन आया था वो रो रहा था....मैने पूछा क्यो क्या कहा उसने....वो बोला कि आप अपनी ख़बरों में भूपिंदर सिंह हुड्डा की तारीफ क्यो करते हैं....उसने तो कुछ काम नहीं करवाया है...आप लोग हुड्डा की तारीफ क्यों कर रहे हैं.....राजीव जी बोले तो फिर उसको वोट मत देना......राजीव जी मुझे देखा और दुखी मन से मुस्कराए...तो फिर मैने कहा कि अब क्या किया जा सकता है.।क्योंकि अब तो ऐसी ही पत्रकारिता करनी पड़ती है....या कहें कि सभी जगह होती है.....जी हां यही सच है पत्रकारिता का...चुनावों के आने से जहां एक ओर नये चैनल खुलने लगते हैं वहीं दूसरी ओर पुराने चैनलों पर पेड स्टोरी की बाढ़ आ जाती है...पेड स्टोरी वो ख़बरें होती है जिसमें भेजने वाला अपनी जमकर तारीफ करता है और उसको चैनल में दिखाने और लोगों तक पहुंचाने के लिए चैनल को पैसे भेजता है...सभी की कीमत तय होती है ....ख़बरों का समय और दिन....सब कुछ तय है कौन सी ख़बर कितने दिन चलेगी कब तक चलेगी....पत्रकारिता के सारे उसूल उस वक्त धत्ता साबित होते है जब इन खबरो को चैनल पर प्रसारित करना पड़ता है....मन दुखी होता है पर करना पड़ता है क्योकि जब आपसे बड़े पत्रकार आपको पेड स्टोरी करने को कहते हैं तो करना पड़ता है और ये सिर्फ एक चैनल की कहानी नहीं है सभी जगह ऐसा ही है.... यही सब सोच रहा था कि तभी अचानक एक और पेड स्टोरी आ गई जिसका मज़मून था.......भूपिंदर सिहं हूडा हरियाणा के लिए जी जान से जुटे हैं...लोगों का भरपूर समर्थन मिल रहा है....बड़ी संख्या में लोग उन्हें सुनने आ रहे हैं...सभी ने उनकी पार्टी को जिताने की कोशिश में हैं....इस बार हरियाणा के लोगों ने उन्हें चुनने का मन बनाया है........अब इन बातों में कितना सच है और कितना झूठ तो उस फोन कॉल से साफ हो गया पर लेकिन ख़बर तो यही चलेगी वो नहीं क्योकि पैसा बोलता है...

मीडिया के कड़वे सच - भाग 2

एक दिन न्यूजरुम में मै अपनी सीट पर बैठा अपना काम कर रहा था....तभी अचानक किसी के चिल्लाने की आवाज आयी....वैसे तो अक्सर न्यूज़रुम में तरह तरह बहस होती है पर ये बहस आम नहीं थी....इस बहस में हिस्सा बने कई बड़े चैनलों में काम कर चुके एक नामी ऐंकर (यहां नाम लेना उचित नहीं है पर फिर भी मै उनक नामकरण 'राज' के तौर पर कर देता हूं) उनकी बहस हमारे के एक सहयोगी (जो कि अभी एक इंटर्न हैं) से हो रही थी....वैसे राज का इस बहस में पड़ना एक झगड़ा सुलझाने वाले बड़े आदमी के तौर पर हुई थी....उससे पहले हमारे सहयोगी की बहस एक महिला कर्मचारी से हो रही थी वो भी किसी काम को लेकर....बहस ने जब उग्र रुप ले लिया तब राज जी को मैदान में लड़ाई शांत करवाने उतरना पड़ा
....लेकिन हमारे सहयोगी का भी गुस्सा शांत नहीं हुआ था....राज जी के चिल्लाने पर भी वो लड़का उनसे बहस करने लगा...तब राज का गुस्सा और भड़क गया....उन्हें शायद ये लगा होगा कि ये अदना सा लड़का उनसे बहस कर रहा है...दूसरी तरफ से लगातार जवाबी कार्रवाई को देख ..इस बहस से राज जी को अपनी वरिष्ठता पर सवाल खड़ा होता दिखाई दिया....तब उन्होने उस लड़के से कहा कि ऐ लड़के तुम मुझसे बहस करोगे......इस पर वो लड़का बोला मेरा नाम ऐ लड़के नहीं रोहित है (काल्पनिक नाम) इतना कहना था कि हमारे एक सीनियर दृश्य संपादक(विडियो एडिटर) का हाथ उठ गया...उन्होंने एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया रोहित के गाल पर.....न्यूजरुम में हुई ये शर्मनाक हरकत यहीं नहीं थमी...सीनियर दृश्य संपादक को हाथ उठाता देख उनके जूनियर ने भी तुरंत एक दो तमाचे और जड़ दिये रोहित पर.....इतना होना था कि चैनल में बवाल मच गया...सभी जूनियर्स ने काम करना बंद कर दिया.....इतने में न्यूजरुम की असली मर्यादा सामने आ गई और सीनियर का अनुशासन की सीख देने का सच सामने आ गया.....इस हाथापाई के बाद कुछ बातें है जिसको बताना जरुरी है क्योकि असली सच अब सामने आयेगा... जैसे कि मैने बतायी कि हमारे एंकर साहब राज जी है जो कि एक चैनल हेड भी हैं और उनके सामने अपने नंबर बढ़ाने का जो खेल खेला गया वो आप अब समझ पाये होंगे......क्योंकि सीनियर दृश्य संपादक ने हाथ इसलिए उठाया ताकि उनके नंबर बढ़ जाए राज जी के सामने और जूनियर दृश्य संपादक ने हाथ उठाया ताकि उनके नंबर बढ़ जाए अपने सीनियर के सामने....जबकि ये तो साफ था कि दृश्य संपादकों का इस बहस में कूदने का कोई औचित्य ही नहीं था....लेकिन मामला चूंकि एक महिला कर्मचारी से बहस से जुड़ा था और इसमें एक चैनल हेड जुड़ गये थे तो इसलिए भी सभी लोग एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे..ताकि चैनल हेड के आगे अपनी वफादारी दिखा सकें या कहें कि दिखावा तो कर ही लें.... हां यहां एक बात और गौर करने लायक है कि अगर महिला की जगह कोई पुरुष कर्मचारी होता तो शायद किसी को बहस में पड़ने की जरुरत महसूस नहीं होती.....मीडिया में काम करने वाली महिला कर्मचारियों के विषय में आगे बात करते रहेगें..उस वक्त जब कोई और बेहूदी घटना मुझे उस पर लिखने को मजबूर करेगी.......

मीडिया के कड़वे सच - भाग 1


नमस्कार मित्रों ...पेशे से मै एक पत्रकार हूं औऱ पिछले कुछ समय से पत्रकारिता से ही कमा खा रहा हूं।इसलिए इस दुनिया की काफी सच्चाईयों से रुबरु होता हूं नितप्रतिदिन। पत्रकारिता के कॉलेज से पत्रकारिता का ककहरा सीखकर जब निकला तो लगा कि मै सही चीज़ चुनी है और मै समाज को एक नयी दिशा दे सकता हूं...पर समय बदला जैसे जैसे मै इस पेशे से जुड़े लोगों से मिलता गया...समाज को सुधारने का सच सामने आता गया....पत्रकारिता आज के समय में मात्र एक पेशा है औऱ कुछ भी नहीं...एक दिन काम करते वक्त मैने देखा कि मेरे एक सीनियर जिनकी मै इज़्जत करता हूं और वो इसलिए क्योंकि पत्रकारिता की दुनिया में वो एक बड़ा नाम है....वो हमारे हेड से बोले--अरे ---देखों वो जो स्टोरी हम चला रहे हैं उसे रोको यार .....क्यों सर क्या हुआ...अरे यार फोन आ रहा है क्यों बेकार में पड़ी लकड़ी ले रहे हो.....इतना कहते ही उनकी नज़र मुझपर पड़ी अचानक पता नहीं उनके दिमाग में क्या आया कि वो हमारे दूसरे सर से बोले ज़रा इधर आओ...फिर थोड़ी दूरी पर जाकर बोले कि देखों मंत्रालय से फोन आया है स्टोरी रोको यार....जब मेरे सीनियर से पूछा कि क्यों रोके चलने दीजिये..तो तैश में आकर बोले की मैने कहा कि रोको....फिर क्या था बड़ा ओहदा है सो रोकना पड़ा....पर मुझे उस घटना के बाद एक बात तो साफ हो गई कि अब बात पत्रकारिता कि नहीं है अब बात है तो सिर्फ पेशे की ...सबको अपनी नौकरी बचानी है न कि समाज को अच्छे सबक देना.....एक दिन तो मैने अपने एक सर सो पूछ लिया कि सर ये कैसी पत्रकारिता है....तो वो बोले कि अगर समाज को बदलने जैसी ख्याल लेकर इस क्षेत्र में क्यों आए समाज सुधारक बनते पत्रकार क्यों बन रहे हो...उनके इस जवाब ने मुझे उलझन में डाल दिया.....एक पल को तो मुझे लगा कि शायद सच हो....और अगर प्रैक्टिकली देखा जाए तो सच भी है...अगर समाज बदलना है तो समाज सेवक बनो पत्रकार नहीं.....मै अभी के लिए तो यहीं कहूंगा और हर रोज एक और सच से आपको रुबरु करवाता रहुंगा जो मेरे सामने गुजरेंगी और सच मानियेगा आप उन सच्चाईयों से रुबरु होकर पत्रकारिता के आज के कड़वे सच को पचा नहीं पायेंगे.....