नमस्कार मित्रों मै इस बार वो लिख रहा जिसका पता चलने के बाद मेरी अंतर्रआत्मा मुझे धिक्कार रही है...लेकिन सच तो ये है कि इसका जवाब शायद किसी भी पत्रकार के पास न हो....मै हमेशा कि तरह काम पर जाने से पहले अपनी सीट पर तैयारियों में जुटा था....तभी मेरे सामने रखे एक फोन पर कॉल आया .मुझे लगा कि ये हमेशा कि तरह कोई नेता अपने खिलाफ़ चल रही किसी ख़बर को रोकने के लिए कॉल कर रहा होगा....मेरे साथ में बैठे मेरे सीनियर कल्पेश ( काल्पनिक नाम) ने फोन उठाया......पता नहीं करीब पांच मिनट तक वो कुछ ख़ास नहीं बोले पर अंत में उन्होने कहा कि उसको वोट मत देना....और फोन रख दिया...दुखी नज़र आ रहे थे...मुझसे बोले कि एक आदमी का फोन आया था वो रो रहा था....मैने पूछा क्यो क्या कहा उसने....वो बोला कि आप अपनी ख़बरों में भूपिंदर सिंह हुड्डा की तारीफ क्यो करते हैं....उसने तो कुछ काम नहीं करवाया है...आप लोग हुड्डा की तारीफ क्यों कर रहे हैं.....राजीव जी बोले तो फिर उसको वोट मत देना......राजीव जी मुझे देखा और दुखी मन से मुस्कराए...तो फिर मैने कहा कि अब क्या किया जा सकता है.।क्योंकि अब तो ऐसी ही पत्रकारिता करनी पड़ती है....या कहें कि सभी जगह होती है.....जी हां यही सच है पत्रकारिता का...चुनावों के आने से जहां एक ओर नये चैनल खुलने लगते हैं वहीं दूसरी ओर पुराने चैनलों पर पेड स्टोरी की बाढ़ आ जाती है...पेड स्टोरी वो ख़बरें होती है जिसमें भेजने वाला अपनी जमकर तारीफ करता है और उसको चैनल में दिखाने और लोगों तक पहुंचाने के लिए चैनल को पैसे भेजता है...सभी की कीमत तय होती है ....ख़बरों का समय और दिन....सब कुछ तय है कौन सी ख़बर कितने दिन चलेगी कब तक चलेगी....पत्रकारिता के सारे उसूल उस वक्त धत्ता साबित होते है जब इन खबरो को चैनल पर प्रसारित करना पड़ता है....मन दुखी होता है पर करना पड़ता है क्योकि जब आपसे बड़े पत्रकार आपको पेड स्टोरी करने को कहते हैं तो करना पड़ता है और ये सिर्फ एक चैनल की कहानी नहीं है सभी जगह ऐसा ही है.... यही सब सोच रहा था कि तभी अचानक एक और पेड स्टोरी आ गई जिसका मज़मून था.......भूपिंदर सिहं हूडा हरियाणा के लिए जी जान से जुटे हैं...लोगों का भरपूर समर्थन मिल रहा है....बड़ी संख्या में लोग उन्हें सुनने आ रहे हैं...सभी ने उनकी पार्टी को जिताने की कोशिश में हैं....इस बार हरियाणा के लोगों ने उन्हें चुनने का मन बनाया है........अब इन बातों में कितना सच है और कितना झूठ तो उस फोन कॉल से साफ हो गया पर लेकिन ख़बर तो यही चलेगी वो नहीं क्योकि पैसा बोलता है...
NewsGram: News media from Chicago
10 years ago

7 टिप्पणियाँ:
प्रिय मित्र
आपकी रचनाओं ने प्रभावित किया। इन्हें प्रकाशित कराने के लिए पत्रिकाओं के पते चाहते हों तो मेरे ब्लाग पर अवश्य पधारें।
अखिलेश शुक्ल्
please log on to
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एक बात तो साफ है कि आप अपने विचारों से इस मीडिया जगत के कुंठित नज़र आ रहे हैं...उम्मीद है...आप शायद पत्रकारिता को नई दिशा देंगे...
बहुत सुंदर लिखा आपने और मै तो कहूंगा ये सच ही है...कि पैसा बोलता है....
सही मीडिया दूत
आगे बढ़ें
"जो देखता हूं वही बोलने का आदि हूं,मैं अपने शहर का सबसे बड़ा फसादी हूं ।" कभी समय था जब पत्रकार ऐसे शेर अपना परिचय देने के लिए इस्तेमाल करते थे...मगर आज अगर एक पत्रकार खुद से जवाब मांगे तो,उलझ जाता है कि आखिर वो है क्या? आज तो लोगों में इतनी भी हिम्मत नहीं है कि वो खुलकर इन चीज़ों को सबके सामने रख सके...आपको इस सही शुरुआत के लिए धन्यवाद..सुधी सिद्धार्थ ।
mittal ke gaand mein metal
बाहुत ही खूबसूरती से लिखा है पर दोस्त इसमे सदा से मीडिया उलट फैर करता आया है आज चड्डा ऊचा है तो क्या हुआ।
और आपकी कोशिश अच्छी है काश मीडिया एसा होता और कर पाता समझ तो जाता ही है।
क्योकि पैसा बोलता है।
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