मीडिया के कड़वे सच - भाग 1


नमस्कार मित्रों ...पेशे से मै एक पत्रकार हूं औऱ पिछले कुछ समय से पत्रकारिता से ही कमा खा रहा हूं।इसलिए इस दुनिया की काफी सच्चाईयों से रुबरु होता हूं नितप्रतिदिन। पत्रकारिता के कॉलेज से पत्रकारिता का ककहरा सीखकर जब निकला तो लगा कि मै सही चीज़ चुनी है और मै समाज को एक नयी दिशा दे सकता हूं...पर समय बदला जैसे जैसे मै इस पेशे से जुड़े लोगों से मिलता गया...समाज को सुधारने का सच सामने आता गया....पत्रकारिता आज के समय में मात्र एक पेशा है औऱ कुछ भी नहीं...एक दिन काम करते वक्त मैने देखा कि मेरे एक सीनियर जिनकी मै इज़्जत करता हूं और वो इसलिए क्योंकि पत्रकारिता की दुनिया में वो एक बड़ा नाम है....वो हमारे हेड से बोले--अरे ---देखों वो जो स्टोरी हम चला रहे हैं उसे रोको यार .....क्यों सर क्या हुआ...अरे यार फोन आ रहा है क्यों बेकार में पड़ी लकड़ी ले रहे हो.....इतना कहते ही उनकी नज़र मुझपर पड़ी अचानक पता नहीं उनके दिमाग में क्या आया कि वो हमारे दूसरे सर से बोले ज़रा इधर आओ...फिर थोड़ी दूरी पर जाकर बोले कि देखों मंत्रालय से फोन आया है स्टोरी रोको यार....जब मेरे सीनियर से पूछा कि क्यों रोके चलने दीजिये..तो तैश में आकर बोले की मैने कहा कि रोको....फिर क्या था बड़ा ओहदा है सो रोकना पड़ा....पर मुझे उस घटना के बाद एक बात तो साफ हो गई कि अब बात पत्रकारिता कि नहीं है अब बात है तो सिर्फ पेशे की ...सबको अपनी नौकरी बचानी है न कि समाज को अच्छे सबक देना.....एक दिन तो मैने अपने एक सर सो पूछ लिया कि सर ये कैसी पत्रकारिता है....तो वो बोले कि अगर समाज को बदलने जैसी ख्याल लेकर इस क्षेत्र में क्यों आए समाज सुधारक बनते पत्रकार क्यों बन रहे हो...उनके इस जवाब ने मुझे उलझन में डाल दिया.....एक पल को तो मुझे लगा कि शायद सच हो....और अगर प्रैक्टिकली देखा जाए तो सच भी है...अगर समाज बदलना है तो समाज सेवक बनो पत्रकार नहीं.....मै अभी के लिए तो यहीं कहूंगा और हर रोज एक और सच से आपको रुबरु करवाता रहुंगा जो मेरे सामने गुजरेंगी और सच मानियेगा आप उन सच्चाईयों से रुबरु होकर पत्रकारिता के आज के कड़वे सच को पचा नहीं पायेंगे.....

12 टिप्पणियाँ:

Anita kumar May 2, 2009 at 7:18 AM  

आप के अगले कड़वे सच का इंतजार रहेगा

D.P. Mishra May 2, 2009 at 7:27 AM  

yahe sach hai

पूनम श्रीवास्तव May 2, 2009 at 8:36 AM  

Sachmuch ye ek kadva sach hai...aj patrakar bandhu apnee gotiyan fit karne par jyada dhyan dete hain...samaj seva par kam.(yadyapi aj bhee kuchh log iske apvad hain)

Anonymous May 2, 2009 at 11:23 AM  

दुनिया की गुत्थियां बहुत उलझी हुई हैं, पर इन्हें सुलझाना कोई अलौकिक कार्य भी नहीं है। ज़िंदगी अपने हिसाब से बहुत कुछ सिखायेगी पर वह नाकाफ़ी है, इसे समझने के लिए।
जरा समय के साथ रहिये...

dhananjay mandal May 2, 2009 at 11:37 AM  

सच दब जाता है सरकारी विग्यापन की किमत में...पुन्जी पतीयो के पैसो कि खनक में ...और हर उस जगह जहाँ कोइ दबाव हो...

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर May 2, 2009 at 6:19 PM  

pesha to pesha hai, chahe patrkarita ho ya veshyavariti, narayan narayan

Unknown May 3, 2009 at 12:32 AM  

pyare bhai, aap k bheetar aag jo hai voh bahar aanedo.........swagat hai....vaise..... sirf press hi nahi, har kshetra me naitik giravat aayee hai......... WISH YOU ALL THE BEST
albela khatri

रचना गौड़ ’भारती’ May 3, 2009 at 1:47 AM  

बहुत अच्छा लिखा है . मेरा भी साईट देखे और टिप्पणी दे

वन्दना अवस्थी दुबे May 3, 2009 at 2:25 AM  

स्वागत है........ शुभकामनायें.

abhivyakti May 3, 2009 at 9:59 PM  

आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . लिखते रहिये
चिटठा जगत मैं आप का स्वागत है

गार्गी
www.abhivyakti.tk

Anonymous May 4, 2009 at 2:34 AM  

लिखते रहो...

Anonymous May 4, 2009 at 2:34 AM  

लिखते रहो...